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Friday, September 6, 2013

विदेशो में जमा कालाधन : हिंदुत्व के लिए सबसे बड़ा खतरा

विदेशो में जमा कालाधन : हिंदुत्व के लिए सबसे बड़ा खतरा , इसे भारत वापस लाना ही होगा नहीं भारत बरबाद हो जायेगा .

हिंदुत्व को सबसे बड़ा खतरा हिन्दू विरोधी ताकतों से है जिन्हें की विदेशो में जमा कालेधन से पोसा ज़ा रहा है-----

१-विदेशो में जमा कालाधन मिशनरियो को मुहैया कराया ज़ा रहा जो हिन्दुओ को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रलोभन के रूप में किया ज़ा रहा. यह कालाधन हमारा  अपना ही धन है जो हमारे खिलाफ प्रयोग हो रहा है.

२-कालाधन उन हिंदुत्व विरोधी देशो को मात्र १-१.५% व्याज पर दिया ज़ा रहा है. जो इसे आतंकियों और मिशनरियो को अनुदान के रूप में दे रहे हैं.

३-यही कालाधन भारत को ऊँचे दर पर कर्ज के रूप में दिया ज़ा रहा है और उन कर्जदाताओ की शर्त पर हम अपना प्राकृतिक संसाधन विदेशी कंपनियों को कौड़ियो के भाव बेंच दे रहे है और ये दुश्मन और पैसा कमाकर भारत को बरबाद कर देंगे. इस समय १२१ करोड़ भारतीयों पर प्रति व्यक्ति ३८८००/- कर्जा है. यह कर्जा निपटने के नाम पर सरकार सरकारी संस्थानों को विदेशियों को बेच देगी.

४-इस कालेधन के प्रभाव में हमारे बीके हुए नेता किसी भी हिंदुत्व विरोधी कानून को तुरंत पास कर देते है जैसे- हिन्दू अंधश्रद्धा कानून,  लक्षित हिंसा विधेयक, 

५-कालाधन भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया ज़ा रहा है जिसमे ९८% हिन्दू ही मरते है भारत में आज तक आतंकवाद में इसाइयों की मौत नगण्य है.

६-भारत में ईसाई बाहुल्य  इलाको में आतंकवाद के नाम पर सिर्फ हिन्दुओ का क़त्ल किया जाता  है और आतंकवाद के नाम पर सरकार इसे हिन्दुओ का नाम मिटने में प्रयोग कर रही है. उत्तर पूर्व में हिन्दू दिनों दिन गायब होते ज़ा रहे है.

७-भारत में अधिकतर कालाधन इन्ही हिन्दू विरोधियो का है जिसे खदानों और योजना-व्यापार के पैसे से लूटा गया है.

८-यदि आप सोनिया के "राष्ट्रीय सलाहकार परिषद्" के सदस्यों की लिस्ट देखे तो आप पाएंगे की इसमे सभी के सभी हिन्दू मूल्यों का विरोध करते है जो हमेशा ही हिंदुत्व विरोधी नियम कानून, अध्यादेश, सलाह, कमिटी, नियुक्तिया आते रहेते है. सोनिया मंडली में सभी लोग हिन्दू नामो वाले मुस्लिम और इसाई हैं.

९-भारत में ४०० लाख करोड़ का कालाधन भारत को हमेशा ही गुलाम बनाये रखने केलिए काफी है जैसे की  इसी में से थोडा सा पैसा  खर्च  करके विदेशी कंपनियों को भारत को लुटाने की खुली छुट मिली हुई है जो की हर साल भारत से २० लाख करोड़ लुट रहे है जो हमारे देश की कुटीर उद्योग को बंद कराकर हमको गुलाम बना दे रही है.

१०-भारत में स्कुलो में पाठ्यक्रम सिर्फ इसी कालेधन के भरोसे ही बदल करके हमारे बच्चो का दिमाग गुलामी की तरफ ले ज़ा रहे है. शिक्षा पर पहले ही माफिया का कब्ज़ा हो चूका है.

११-भारत में २०००० लाख करोड़ की सम्पदा को लुट लुट कर विदेश में जमा किया ज़ा रहा और गरीबो पर धौंस जमाया ज़ा रहा है, जनता सोचती है की हमारा क्या ज़ा रहा है यदि कोयला में सिर्फ मन्होहन के कार्यकाल में २६ लाख करोड़ का लुट मचा है.आज बाजार में १२/- किलो बिकने वाला कोयला १० पैसे किलो पर लुटा दिया गया. इसमे भी कालेधन का खेल हुआ.

१२-पेट्रोलियम में कालेधन का खेल तो पुरे भारत वासिओ का होश उड़ा देगी जब यह खुलकर सामने आयेगा 

क्योकि भारतीयता और हिंदुत्व में  ज्यादा फर्क नहीं है और भारत में रहेने वाले ९९.९९% भारतीयों के पूर्वज हिन्दू रहे है जिससे उनके जीवन में हर कदम पर हिंदुत्व का दर्शन होता. हिंदुत्व को ये बर्बाद नहीं करा रहे है, हिंदुत्व को .०१% भारतीय और विदेशो में हमारे दुश्मन ही हिंदुत्व को बरबाद करने पर तुले हुए है जिसके लिए हराम के कालेधन का बखूबी इस्तेमाल किया ज़ा रहा है और कांग्रेस सरकार इसमे अपना अहम् रोल अदा करा रही है.

इसलिए भारत की लुट के इस कालाधन को वापस लाना बहुत जरुरी है, परन्तु कालाधन को लाने में हिंदुत्व विरोधी ताकतों को कोई रूचि नहीं है न टीवी वालो को, न कांग्रेस सरकार को. हर भारतीय  को या तो कालेधन के अभियान को सहयोग करना चाहिय नहीं तो विरोध-चुपचाप कतई नहीं बैठे.

Thursday, November 24, 2011

भारत की राष्ट्रप्रेमी जनता से इतना बड़ा धोखा तो अंग्रेजो ने भी नहीं किया था क्या अब काले धन के बारे में देश को कोई जानकारी नहीं दी ज़ा सकेगी


दोस्तों , भारत की राष्ट्रप्रेमी जनता से इतना बड़ा धोखा तो अंग्रेजो ने भी नहीं किया था  अब काले धन के बारे में देश की जनता को कोई जानकारी नहीं दी ज़ा सकेगी- धीरज के साथ जरुर पढ़े इस सलग्न पत्रक को.-----
१- कांग्रेस ने अन्तराष्ट्रीय भ्रष्टाचार समझौते को दो साल बाद बहुत हिला हवाली के बाद हस्ताक्षर किया.
२- इसे लागु करने की सहमति इन्होने २०११ में दी स्वामी रामदेव जी के आन्दोलन के बाद और वादे के बावजूद काले धन को "राष्ट्रीय संपत्ति" घोषित नहीं किया, क्योकि भारत के राष्ट्रीय सम्पत्ति को कोई देश अपने यहाँ नहीं रख सकता है......
३-इस बीच ए कांग्रेसी करीब ७० देशो दे शातिराना अंदाज़ में दोहरे कराधान की  संधि कर डाले हैं और आगे भी करते ज़ा रहे है जिससे की भारत की जनता को  सिर्फ अप्रैल-२०१२ के बाद के ही पैसे का लेन देन जानने का हक़ होगा यानि पहले का कला धन कहा है, किसका है, कैसे कमाया, कितना है, जनता नहीं  जान पायेगी और विदेशी बैंक इस समझौते  का हवाला देकर जानकारी देने से बच जायेगे.
४-अडवानी लोगो को बेवकूफ बना रहे हैं, नहीं तो  इसपर हंगामा खड़ा देते और भारत की जनता साथ देगी, लेकिन लगता है उनका भी पैसा विदेश में जमा है...
५- काले धन पर सिर्फ स्वामी राम देवजी ही लगे है और उनका आन्दोलन असर भी दिखाना  शुरू कर चूका है और जनवरी-२०१२ में एक बड़ा आन्दोलन शुरू होने ज़ा रहा है जिसमे सभी नौजवानों को बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना होगा.
६-सर्कार जानबूझ कर नौजवानों का ध्यान उधर से हटा कर रखती है, कभी क्रिकेट में कभी सेरियल में, अन्ना जी भी एक बार  भी काले धन को नहीं उधृत नहीं किया.
७-न्यूज चैनलों पर इतना पैनल चर्चा  होती है लेकिन कभी काले धन पर कोई चर्चा  नहीं किये, इसका मतलब क्या है...
८-सोनिया और राहुल ने कभी भी काले धन पर कोई विचार नहीं दिया क्यों...
९- सरकार तो भ्रष्टाचार पर  तो नौटंकी कर रही है लेकिन काले धन पर लोगो को  सिर्फ गुमराह कर रही है क्योकि यह काला धन ४००,००,००० करोड़ से भी कही ज्यादा  है. 
कृपया इसे जरुर पढ़े और कम से कम ५० लोगो को अग्रेषित करके सबको जागरुक करे......
अपना राष्ट्र धर्म निभाए----

Sunday, October 9, 2011

काला धन





- बी.आर. लाल
टैक्स हैवेंस में पड़े धन के बारे में अनुमान लगाया। इन अनुमानों से यह निष्कर्ष भी निकाला कि दुनिया में जितना पैसा टैक्स हैवेंस में है, उसका 50 प्रतिशत विकासशील देशों का है और इसमें से आधे से अधिक भारतीयों का है। यानी कुल जमा राशि में भारतीयों का लगभग हिस्सा 40 प्रतिशत है।

विदेशी बैंकों में जमा भारत के काले धन पर पिछले दो दशकों से बहस हो रही है। वर्ष 1996 में स्विस बैंक के एक निदेशक ने भारत दौरे के दौरान यह जानकारी देकर सनसनी फैला दी थी कि भारतीयों के स्विटजरलैंड के बैंक खातों में 2550 अरब डालर अर्थात 120 लाख करोड़ रुपये जमा हैं। 2008-09 में एक और निदेशक ने यही मुद्दा उठाया कि प्राइवेट स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि 1456 अरब डालर अर्थात 70 लाख करोड़ रुपये है। इन दोनों राशियों में कोई विरोधाभास नहीं, क्योंकि 2008-09 के आंकड़े केवल प्राइवेट बैंकों के हैं। कारपोरेट बैंक इनमें शामिल नहीं हैं। उस समय एलजीटी का मामला गरमा रहा था और चुनाव भी सिर पर थे।
राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को तूल दिया तो जनता भी जागी कि यह भारी भरकम राशि भारत में वापस आनी चाहिए। इस बीच मंदी आने पर उन्नत देशों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित हुआ और विभिन्न संस्थान इस बारे में गंभीर हुए। उन्होंने अपना धन वापस लाने के लिए प्रयत्न किए और टैक्स हैवेंस में पड़े धन के बारे में अनुमान लगाया। इन अनुमानों से यह निष्कर्ष भी निकाला कि दुनिया में जितना पैसा टैक्स हैवेंस में है, उसका 50 प्रतिशत विकासशील देशों का है और इसमें से आधे से अधिक भारतीयों का है। यानी कुल जमा राशि में भारतीयों का लगभग हिस्सा 40 प्रतिशत है। ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी (जीएफआई), टैक्स जस्टिस नेटवर्थ (टीजेएन), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि अनेक संस्थान इस समस्या पर नजर रखे हैं, विस्तृत विश्लेषण कर रहे हैं और धन की वापसी के लिए जूझ रहे हैं।
इस बीच जीएफआई ने यह कह कर सबको चौंका दिया कि भारत का विदेशी खातों में कुल पैसा 462 अरब डालर यानी 20 लाख करोड़ है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 1948-2008 के बीच भारत से बाहर केवल 213 अरब डालर गया था। बाकी इस पर ब्याज आदि की कमाई है, जबकि जीएफआई के अपने ही पुराने अनुमान कहीं ऊंचे हैं। यह बदलाव क्यों? जब यह जानने के लिए मैंने इस रिपोर्ट का गहन अध्ययन किया तो स्थिति स्पष्ट हुई कि यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केवल एक पहलू पर आधारित है, जो केवल माल (वस्तुओं) का ही हिसाब लगाता है। यहां तक कि सेवाओं को भी इसमें शामिल नहीं किया जाता। यही नहीं, आगे इस अनुमान का दायरा और सिकुड़ जाता है, जब यह रिपोर्ट कहती है कि यह अनुमान केवल माल के बिल की मिसप्राइसिंग पर आधारित है। रिपोर्ट में जीएफआई स्वयं यह मानती है कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि यह भारी-भरकम राशि भी कम करके दिखाई गई है। यह बात ठीक भी है, क्योंकि 1948-2008 तक के निर्यात व आयात के कुल आंकड़े 1422 अरब व 1834 अरब डालर के हैं। एक शोध के अनुसार भारत निर्यात पर कम से कम 40 प्रतिशत और आयात पर 20 प्रतिशत गंवाता है। इस तरह भारत को इस समय में कम से कम 932 अरब डालर का नुकसान हुआ है, जबकि जीएफआई केवल 213 अरब डालर बता रही है, वह भी बिना किसी तर्क के।
रिपोर्ट स्वयं बताती है कि जीएफआई ने काला धन पैदा होने के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों का संज्ञान ही नहीं लिया। इनमें प्रमुख हैं- नशीली दवाओं की तस्करी, फर्जी बिलिंग से आयात-निर्यात, हवाला, यौन व्यापार, घोटाले, नकली मुद्रा, अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध, मानव तस्करी, भ्रष्टाचार और अन्य आपराधिक गतिविधियों से उत्पन्न धन। अनेक अध्ययनों के अनुसार फर्जी बिलों के माध्यम अगर अधिक नहीं, तो वास्तविक बिलों जितना घोटाला जरूर होता है। भारत में काले धन के बारे में यही सबसे बड़ा मुद्दा है। जीएफआई ने स्वयं अपनी एक और रिपोर्ट में कहा है कि विकासशील देशों का, जिसमें भारत का विशेष जिक्र है, भ्रष्टाचार का पैसा केवल पांच प्रतिशत है। विभिन्न अपराधों से संचित राशि 30-35 प्रतिशत है व टैक्स चोरी से संचित काला धन 60-65 प्रतिशत है, परंतु फिर भी वर्तमान रिपोर्ट इस मुख्य मुद्दे की बात ही नहीं करती।
यदि काले धन के इतने स्रोतों का संज्ञान नहीं लिया जाएगा तो इसकी सही राशि का आकलन नहीं किया जा सकता। वैसे भी यह रिपोर्ट दिग्भ्रमित करने वाली है। रिपोर्ट कहती है कि 2008-09 में भारत की सकल आय 1250 अरब डालर थी और काले धन की उत्पत्ति उसकी आधी यानी 640 अरब डालर थी। रिपोर्ट के अनुसार इस काले धन में से 462 अरब डालर तो विदेशों में है व 178 अरब डालर भारत में, जबकि सकल उत्पाद का आंकड़ा हर साल का है। काले धन की 640 अरब डालर की उत्पत्ति भी वर्ष विशेष के लिए है, फिर 60 साल में संचित काले धन का इससे कैसे मुकाबला किया जा सकता है। जब इतने भारी मुद्दे छोड़ दिये गये हैं तो इस अनुमान का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। न जाने यह रिपोर्ट किस मतलब से लिखी गई है, परंतु यह स्पष्ट है कि जैसे-तैसे यह रिपोर्ट सिध्द करना चाहती है कि विदेशों में भारत का धन 60 वर्षों में केवल 213 अरब डालर गया जो कि प्रतिवर्ष औसत 3.5 अरब डालर है और यह बहुत छोटी राशि है व भारत की जनता नाहक ही इतना शोर मचा रही है।
ये अति भ्रामक आंकड़े हैं, जो विश्लेषण की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसके विरुध्द आइएमएफ के अनुसार इस समय सभी 77 टैक्स हैवेंस में कुल जमा राशि 18.000 अरब डालर है। 40 प्रतिशत के हिसाब से भारत का हिस्सा 7.200 अरब डालर यानी 350 लाख करोड़ रुपये बनता है। भारत के विदेशों में जमा काले धन को कमतर आंकने का जीएफआई का मकसद स्पष्ट नहीं है, परंतु हमें इस भ्रामक जाल में नहीं फंसना चाहिए। हमें इस इस विपुल राशि को वापस लाने व अब और धन बाहर जाने से रोकने में पूर्ण प्रयास जारी करने चाहिए।
(लेखक सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं।)